Tuesday, 13 March 2012

नारी की उत्कंठा

उस रात
चाँद नहीं निकला था
आकाश अँधेरे से
सरोबार था
पुरुष ने स्त्री को देखा
उसने उसकी देह की भाषा
पढ़ ली थी,

उसको बहलाया फुसलाया

उसके कसीदे में गीत लिखे
उस पर कविताएं लिखी
उसको आजादी का अर्थ बताया
तरक्की के गुण बताये
आखेट पर निकलने का शौक रखने
वाले की तरह
जगह जगह जाल बिछाया
नारी मुक्ति की बात कही
सपनों के स्वपनिल संसार का
झूठ बोला,

स्त्री ने प्यार भरी आँखों से

उसकी आँखों में झांका,
तीतर की तरह पंख फड़फड़ाता
पुरुष उसको
निरीह सा लगा
वह उसे देखकर मुस्कराई
और सपनो के सुनहरे संसार में
उड़ने लगी

आकाश की उत्कंठा में

लुका-छिपी का खेल देर-देर तक
चलता रहा
थके हुए क्षणों से
जिस चीज पर नारी नीचे गिरी
वह पुरुष का करीने से
बिछाया हुआ बिस्तर था..........................रवि विद्रोही ..

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