Saturday, 17 March 2012

विष की लोह भस्म

संगृहीत हैं रुग्नाव्यस्था
विषाक्तता कुचित गति से
आगे बढ़ती हैं
हम विविध कल्पो में
अमृत बाटते हैं
कल्प सेवन करने से पहले
किसने घोला विष ,
हे सूर्य पुत्र
चिरकालीन पथ्य स्थिर और ह्रास हैं
आओ ,
साँसों की सौन्दर्योपचारो में दूषित
अमृत को शुद्ध करे
मन की दुर्लब वातव्याधि
अभी भी जीर्ण हैं ,
ढक दो ढक्कन
इस आयुष्यवर्धक बर्तन का
कुत्सित अव्यवस्था ने अमृत में
लोह भस्म मिलाई हैं ..................रवि विद्रोही

Wednesday, 14 March 2012

. पहरेदार

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मार्क्स हर रात
कब्र से बाहर निकलेंगा
उठ खड़ा होगा कब्र के ऊपर
और छू कर देखेंगा कब्र का हर पत्थर
कहीं किसी मुल्ले पण्डे पादरी  ने
मिटा तो नहीं दिया
कब्र के पत्थर पर से
कार्ल मार्क्स का नाम......
...........रवि विद्रोही

मार्क्सवाद

.
असहनीय चिल्लाहट सुनकर
मार्क्स कब्र के बाहर आया
और बोला सोने दे मुझे
हे निलज्ज इंसानों
तुम्हारे बेतुके विमर्श ने
मेरी  कब्र के हर पत्थर को
हिलाके रख दिया
तुम्हारे खुरचने की आदत ने
मिटा दिया हर पत्थर से
मेरा नाम .......................
.........रवि विद्रोही

Tuesday, 13 March 2012

आसमान


क़यामत की रात
मेरी नहीं तुम्हारी हैं
जिसे तुम रोशनी समझ रहे हो
वो कफस की रोशनाई हैं
फूल कोई भी हो
कांटो पर ही अच्छा लगता हैं

.

हकदार

.
जब आसमान अंगड़ाई लेता हैं
और बादलो का झाग उगलता हैं
पृथ्वी आँखे फाड़कर
आसमान को देखती हैं
और कहती हैं
मैंने तेरा बुरा कब चाहा
हे निर्मोही आसमान

नारी की उत्कंठा

उस रात
चाँद नहीं निकला था
आकाश अँधेरे से
सरोबार था
पुरुष ने स्त्री को देखा
उसने उसकी देह की भाषा
पढ़ ली थी,

उसको बहलाया फुसलाया

उसके कसीदे में गीत लिखे
उस पर कविताएं लिखी
उसको आजादी का अर्थ बताया
तरक्की के गुण बताये
आखेट पर निकलने का शौक रखने
वाले की तरह
जगह जगह जाल बिछाया
नारी मुक्ति की बात कही
सपनों के स्वपनिल संसार का
झूठ बोला,

स्त्री ने प्यार भरी आँखों से

उसकी आँखों में झांका,
तीतर की तरह पंख फड़फड़ाता
पुरुष उसको
निरीह सा लगा
वह उसे देखकर मुस्कराई
और सपनो के सुनहरे संसार में
उड़ने लगी

आकाश की उत्कंठा में

लुका-छिपी का खेल देर-देर तक
चलता रहा
थके हुए क्षणों से
जिस चीज पर नारी नीचे गिरी
वह पुरुष का करीने से
बिछाया हुआ बिस्तर था..........................रवि विद्रोही ..

Sunday, 11 March 2012

सुखद सपने

अन्धो के इस शहर में
मेरा शीशे का व्यापार है
यहाँ धुंद की मृत्तिका अंधेरी है
फिर भी आँखों में सुनहरे भविष्य की
अकुलाहट का अधिकार है
झुलसी आशाओं की
सफ़ेद अंधेरी रातो में
एक नहीं ना जाने कितने
खुदगर्ज चाँद आ रहे है
मुझे मालूम है दर्पण के भाव ऊँचे है
और अन्धो की सोच ज़िंदा है
उनकी जाग्रत हंसी और सुरमे की सलाई
दर्पण में नजर नहीं आती
अंधी आँखों में आशाओं के सुखद सपने
फिर भी उन्हें भा रहे
और क्या कमाल है जनाब
अन्धो के इस शहर में
खोते जाइये और कहते रहिये
कि पा रहे हैं...

Saturday, 10 March 2012

वासना

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महाभारत पढी और जाना

धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे
और दस रानियाँ
जबकि वो अंधा था ,
अंधे पुरुष की अंधी वासना ,

पांडू के दो पत्नी  थी
और छ पुत्र
जबकि वो नपुकसंक था
नामर्द इंसान की छुपी  हुई  वासना

श्री कृष्ण के
सौलह हज्जार पत्नी  थी
और अनगिनित प्रेयेसी
जबकि वो भगवान था
मस्त भगवान की मस्त वासना

Friday, 9 March 2012

कूहसार

किस तार बाहर निकलू ,कूहसार तूफानों से
आँधी ने फलक अपना, तारीक बनाया हैं ........रवि विद्रोही

तार= तरिका
कूहसार= पहाड़
फलक= आसमान
तारीक = घना अन्धेरा / काला

इन पहाड़ जैसे विशाल तूफानों से मैं अपने आप को कैसे बचाऊ ...इस तूफानी बवंडर से कैसे बचू ..
इस बुरी आंधी ने आसमान को भी बुरी तरह ढक लिया हैं ..आसमान पर चारो और घना काला अन्धेरा छा गया हैं ...जहां कुछ भी नजर नहीं आ रहा ...

खुदाई तुझ में ही खुद हैं

नक्श नापेद हैं तेरा ,जलाजिल तू ही मस्दर हैं
तू अश्रफ हैं खुदाया की ,खुदाई तुझ में ही खुद हैं .......रवि विद्रोही

कुछ और हैं

सब थी सहर तब नूर था,नहीं इश्क अब पुरजोर हैं
डूबी हुई इस शाम में ,शायद वो अब कुछ और हैं ......Ravi Vidrohee

सहर= सुबह
नूर= उजाला

हम कैसे पढ़े

गतिहीन हैं अवचेतना,विनोक्ति भी अनुलोम हैं
फैसल -तलब आशुफ्त हैं,तक्बीर हम कैसे पढ़े ...............रवि विद्रोही


विनोक्ति=बिना चंद्रमा की रात
फैसल-तलब जिसका निर्णय होना बाकी हो
आशुक्त=व्याकुल /अस्त-व्यस्त
तक्बीर=नमाज में झुकते , बैठते खड़े होते वक्त पढ़े जाना वाला इश्वर का नाम

तहकीर सुनो

आँखों की तुम तक्सीर सुनो
आंसू में तुम तबशीर सुनो
आँखों ने पाया था कल जो
उस कल की तुम तहकीर सुनो ...........रवि विद्रोही ....

नमाज से तौबा

जाकर खुदा कह दो, अब नमाज से हैं तौबा
तक्बीर के इरादे ,गुनाहागार हो रहे हैं ..............रवि विद्रोही

हसरत नश्तर

ये फराज है जो हसरत नश्तर
क्या कसक है फलक दीवानी में
खिलती है तजम्मुल होठो पर
क्या खूब हँसी ये जवानी में.......................रवि विद्रोही

फराज= उचाई/ बुलंदी
तजम्मुल =सजावट

अन्सफ़ नादान

ख्यालो की निगाहबां में,अन्सफ़ नादान हैं कोई
वो खुद मेरा कल्ब हैं जी ,नहीं मेहमान हैं कोई .......रवि विद्रोही

अन्सफ़= बहुत ही प्यारा
कल्ब - ह्रदय

मुहब्बत की वुसअत


ख्याले खाम नहीं हैं मुहब्बत की वुसअत
खुद खुदाई तस्हील हैं हुश्ने नुबुव्वत में ........रवि
...

Tuesday, 6 March 2012

खुमार

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 आँखों की तुम तक्सीर  सुनो
आंसू की तुम तबशीर  सुनो
आँखों ने पाया था कल जो
उस कल की तुम तहकीर  सुनो ...........रवि विद्रोही ....


तक्सीर=भूल/दोष /अपराध
तबशीर= सन्देश/सुचना
तहकीर= निंदा/अपमान/अनादर

दलित नेतृत्व..

भारत में दलित आज भौचक्के हैं उफाफोह में हैं....आज उन्हें लगता हैं कि  न उनको धर्म में सम्मान मिलता ना समाज में और ना ही राजनीति में ....जाए तो कहाँ जाए.... दरअसल ये सब कुशल, साकारात्मक   इमानदार व   प्रभावशाली  नेतृत्व ना होने की वजह से हैं .बिखरा हुआ संघठन उन्हें और नीचे ले जा रहा हैं...दम्भी , आकारात्मक असंगठित     नेतृत्व कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो अगर वह इमानदार और अपने  कृत्तव्यो के प्रति    समर्पित और उदार और संघठित नहीं  तो  मंजिल से पहले ही दम तौड़ देता हैं..दलित शक्ति को आज एक ऐसे प्रभावशाली नेतृत्व की जरुरत हैं जो सबको एक जगह बाँध ले जो ना  केवल सभ्य , शालीन और  बुद्धीमान हो बल्कि उदार , इमानदार और अपने काम के प्रति समर्पित  हो और सबको एक साथ संघठित कर सके ..प्राभावाशाली  नेतृत्व इतना बल शाली और कद्दावर हो कि इस शक्ति के उबाल को थाम सके और उनकी बहतरी के लिए इमानदारी से काम सके क्योकि इस शक्ति के उबाल में सदियों से दबी अपेक्षाए बहुत ज्यादा हैं और  उनकी अपेक्षाओं व  बहतरी का नतीज़ा शुन्य के आस पास ही मंडराता नजर आता हैं ..अपेक्षायो की भूख  तभी मिट पायेगी जब नेतृत्व वाकई इमानदारी और सच्चाई और संघठित होकर   काम करेगा .....केवल और केवल बिखरी हुई व्यक्तिगत सत्ता की भूख अपेक्षाओं को   बढाती ही हैं घटाती नहीं ..सता की भूख व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक हो सबके लिए हो , सबकी बहतरी के लिए हो तभी अपेक्षाए शांत हो पायेगी ....समाज के सब तबको को  साथ लेकर चलने की शक्ति का अभी दलित नेतृत्व में अभी बहुत अभाव हैं  ....सम्मान की भागीदारी तभी मिल पायेगी जब सबको उनके  ..अपेक्षाओं की प्राप्ति ही  सम्मान को आमंत्रित करती हैं ..बिना अपेक्षाओं को प्राप्त किये बिना  कोई भी समाज सम्मान नहीं पा सकता तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ सकता