Tuesday, 6 March 2012

दलित नेतृत्व..

भारत में दलित आज भौचक्के हैं उफाफोह में हैं....आज उन्हें लगता हैं कि  न उनको धर्म में सम्मान मिलता ना समाज में और ना ही राजनीति में ....जाए तो कहाँ जाए.... दरअसल ये सब कुशल, साकारात्मक   इमानदार व   प्रभावशाली  नेतृत्व ना होने की वजह से हैं .बिखरा हुआ संघठन उन्हें और नीचे ले जा रहा हैं...दम्भी , आकारात्मक असंगठित     नेतृत्व कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो अगर वह इमानदार और अपने  कृत्तव्यो के प्रति    समर्पित और उदार और संघठित नहीं  तो  मंजिल से पहले ही दम तौड़ देता हैं..दलित शक्ति को आज एक ऐसे प्रभावशाली नेतृत्व की जरुरत हैं जो सबको एक जगह बाँध ले जो ना  केवल सभ्य , शालीन और  बुद्धीमान हो बल्कि उदार , इमानदार और अपने काम के प्रति समर्पित  हो और सबको एक साथ संघठित कर सके ..प्राभावाशाली  नेतृत्व इतना बल शाली और कद्दावर हो कि इस शक्ति के उबाल को थाम सके और उनकी बहतरी के लिए इमानदारी से काम सके क्योकि इस शक्ति के उबाल में सदियों से दबी अपेक्षाए बहुत ज्यादा हैं और  उनकी अपेक्षाओं व  बहतरी का नतीज़ा शुन्य के आस पास ही मंडराता नजर आता हैं ..अपेक्षायो की भूख  तभी मिट पायेगी जब नेतृत्व वाकई इमानदारी और सच्चाई और संघठित होकर   काम करेगा .....केवल और केवल बिखरी हुई व्यक्तिगत सत्ता की भूख अपेक्षाओं को   बढाती ही हैं घटाती नहीं ..सता की भूख व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक हो सबके लिए हो , सबकी बहतरी के लिए हो तभी अपेक्षाए शांत हो पायेगी ....समाज के सब तबको को  साथ लेकर चलने की शक्ति का अभी दलित नेतृत्व में अभी बहुत अभाव हैं  ....सम्मान की भागीदारी तभी मिल पायेगी जब सबको उनके  ..अपेक्षाओं की प्राप्ति ही  सम्मान को आमंत्रित करती हैं ..बिना अपेक्षाओं को प्राप्त किये बिना  कोई भी समाज सम्मान नहीं पा सकता तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ सकता

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