Tuesday, 3 April 2012

चिर रहस्य ....


स्त्री के ह्रदय पर लिखे शब्द शायद ही हम पढ़ पाए ...आप स्त्री का सानिध्य इसलिए पाते हो कि आप मस्त हो जाओ और स्त्री इसलिए चाहती हैं कि वह आपकी मस्ती को कम कर दे ..जब वह मांगती हैं किसी के लिए तो जीवन तत्त्व मांग लेती हैं समस्त जीवन को प्रकट कर देती हैं ..मगर इसके बावजूद भी वह एकेलापन महसूस करे तब हम उसके अंतकरण की व्याख्या नहीं कर सकते ..बार मांगती हैं रहती वो रहस्य जहा वो सचमुच विचरण कर सके...पर क्या हम उसे ये दे पाए...

क्या मांगू मै उनसे
जिनके लिए माँगा था शहर
एक नाजुक वक्त में
वो बादलो को मेरे सीने पर
लाकर छोड़ देता है ,
धुप के नीचे
दिल के करीब
उस मुलाक़ात में
ना प्रश्न हैं ना उत्तर
ना निवेदन की तलाश,
मौन आँगन में
चुप-चुप छन कर आती धुप
नाज़ुक नहीं नटखट सी है
जख्म आज उतना बड़ा नहीं
जितना बड़ा प्रतीक्षारत होना,
करवटो में अक्सर
हल्‍की-हल्‍की वो चमक
सुन्न परिस्थितियाँ में
बेजुबान साज सी लगती है,
अनपढ़ बिलकुल ही अनगढ़,
आओ ,चले फिर से मदरसों में
कोई पाठ पढ़े,
स्मिति में छिपे
उन रहस्यों को बांचे
जहा चिर रहस्य रहता है
इतिहासों के बीच,
आओ ,
करीब और करीब आके
उस शहर को फिर से मांगे
जो माँगा था किसी के लिए

मन का विश्लेषण

स्त्री के कथित मन का विश्लेषण ..शायद इसे में गर्व हैं और इसी में साहस भी ...कुछ लोग स्वर्ग को तो तलाश लेते हैं मगर उसके द्वार की चाबी खो बैठते हैं ..मैंने स्त्री के मन में झांका और स्वर्ग की चाबी उसकी आँखों में कैद पाई,, मैंने कहा तुम मेरी आत्मा का दुसरा रूप हो क्या द्वार नहीं खोलोगी ..स्त्री ने झुक कर मेरी आँखों में देखा और कहा ..

कविता शब्द गढ़ती है
खुरदरे भी नाजुक भी
गीले गीले भाव से सने शब्द,
थर थर कांपते शब्द,
पीपल के पात जैसे
झन झन करती कठोर हँसी
ग्रास लिपटी जो
शिराओं से होती हुई
ह्रदय को थरथराती है ,
क्यों गढ़ते हो शब्द
मुझे गूंगी ही रहने दो,
नहीं दे पाउंगी उत्तर
सवाल पूछते शब्दों का
तुम्हारे साथ गहरे उतर कर
उस पोखर में
जहां रात आती है पूछने
चाँद क्यू नहीं निकला ,
औरत को पाने के सौ बहाने करते शब्द
गीले हो जाते है
तुष्टीकरण की आगे,
गूंगी हो जाती है भाषा
फिसलते है शब्द
सीने ने उठते है राग,
डरती हूँ दृढ़ता से
भावी स्वप्न स्नेह-प्रतीती शब्दों से
कही उत्पन ना कर दे अबोध बैराग्य ,
लीप दो मिट्टी हर चीज पर
सुबह सुबह
काले आकाश में खडीया से
लिखाई की है मैंने
शब्द आयेगे
बताने उत्तर .......

Saturday, 17 March 2012

विष की लोह भस्म

संगृहीत हैं रुग्नाव्यस्था
विषाक्तता कुचित गति से
आगे बढ़ती हैं
हम विविध कल्पो में
अमृत बाटते हैं
कल्प सेवन करने से पहले
किसने घोला विष ,
हे सूर्य पुत्र
चिरकालीन पथ्य स्थिर और ह्रास हैं
आओ ,
साँसों की सौन्दर्योपचारो में दूषित
अमृत को शुद्ध करे
मन की दुर्लब वातव्याधि
अभी भी जीर्ण हैं ,
ढक दो ढक्कन
इस आयुष्यवर्धक बर्तन का
कुत्सित अव्यवस्था ने अमृत में
लोह भस्म मिलाई हैं ..................रवि विद्रोही

Wednesday, 14 March 2012

. पहरेदार

.
मार्क्स हर रात
कब्र से बाहर निकलेंगा
उठ खड़ा होगा कब्र के ऊपर
और छू कर देखेंगा कब्र का हर पत्थर
कहीं किसी मुल्ले पण्डे पादरी  ने
मिटा तो नहीं दिया
कब्र के पत्थर पर से
कार्ल मार्क्स का नाम......
...........रवि विद्रोही

मार्क्सवाद

.
असहनीय चिल्लाहट सुनकर
मार्क्स कब्र के बाहर आया
और बोला सोने दे मुझे
हे निलज्ज इंसानों
तुम्हारे बेतुके विमर्श ने
मेरी  कब्र के हर पत्थर को
हिलाके रख दिया
तुम्हारे खुरचने की आदत ने
मिटा दिया हर पत्थर से
मेरा नाम .......................
.........रवि विद्रोही

Tuesday, 13 March 2012

आसमान


क़यामत की रात
मेरी नहीं तुम्हारी हैं
जिसे तुम रोशनी समझ रहे हो
वो कफस की रोशनाई हैं
फूल कोई भी हो
कांटो पर ही अच्छा लगता हैं

.

हकदार

.
जब आसमान अंगड़ाई लेता हैं
और बादलो का झाग उगलता हैं
पृथ्वी आँखे फाड़कर
आसमान को देखती हैं
और कहती हैं
मैंने तेरा बुरा कब चाहा
हे निर्मोही आसमान