Monday, 27 February 2012

भारत में जाति , वंश और गोत्र की अवधारणा

भारत में जाति  , वंश और गोत्र  की अवधारणा

जाति.......
आर्य समाज में जाति व्यवस्था नहीं होती थी वहाँ वर्ण व्यवस्था थी ...जाति की व्यवस्था भारतीय समाज में आर्यों के आने से बहुत पहले से ही थी ..जाति का सम्बन्ध व्यक्ति के कार्यो से निर्धारण होता था ..आर्यों  ने   भारत पर आक्रमण करके भारतीय राजनीति  पर अपना प्रभ्त्व स्थापित कर लिया था और भारतीय समाज को अपनी वर्ण वाव्यस्था में मिलाने के लिए एक नया वर्ण   बनाया जिसको शुद्र कहा गया ..भारतीय समाज की मूल वासी परम्परा के मुताबिक़ शुद्रो में जाति व्यवस्था  कायम रही जो आज तक हैं ..भारत मे आर्यों ने अपने प्रभ्त्व के  पश्चात पूरे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो में विभक्त कर दिया ..ये ही कारण था आर्यों ने चोथे वर्ण को अपने में मिला तो लिया परन्तु धार्मिक अधिकारों और पूजा पाठ से वंचित रखा .. आज भी ब्राह्मण , क्षत्रीय तथा वैश्य वर्ण हैं आज भी इनमे जाति नहीं होती जबकि शुद्र जाति व्यवस्था  से आज भी जुड़े हुए हैं ..हिन्दू धर्म में शुद्रो की पहचान जाति हैं वर्ण नहीं जबकि बाकी तीनो की पहचान वर्ण से हैं जाति से नहीं ..भारत में दलित अंत्यज या अछूत जातियाँ यद्यपि हिंदू समाज क अंग रही लेकिन    वर्णव्यवस्था में उनका कोई स्थान नहीं है इसलिए शुद्र अपने आप को इन जातियों से उंचा मानते रहे हालाकि जाति व्यवस्था इनमे भी कायम रही ..आज हम शुद्रो का अर्थ दलितों से लगाते हैं किन्तु यह बात भ्रमित हैं दलित शुद्र नहीं वर्ण में नहीं आते बल्कि जो जाति ब्राहमण , क्षेत्रीय,वैश्य या दलित नहीं वो शुद्र हैं

वंश ...
वंश का निर्धारण व्यक्ति के पूर्वज और स्थान से निर्धारित होता था ..आर्यों के वंशज भारत से बाहर के लोग थे जबकि आर्यों के चौथे वर्ण शुद्रो के वंशज मूल भारतीय के ..अब चुकी जाति का सम्बन्ध व्यक्ति के कार्यो से होता था अत किसी विशेष क्षेत्र या जाति  में एक ही काम करने वाले विभिन्न लोग होते थे जो भिन्न भिन्न वंशो से जुड़े होते थे ..प्राचीन अनार्य सभ्यता में इस बात का अधिकार होता था कि व्यक्ति अपना काम बदल सकता  था इसी  काम से उसकी  जाति की पहचान निर्धारित होती थी ..जाति में भिन्न भिन्न वंशो के व्यक्ति जुड़े हुए थे ...वंश यानी एक की व्यक्ति का समूह या उससे उत्पन्न संतति समूह  

गोत्र..
गोत्र की अवधारा मूल भारत  वासियों यानी शुद्रो में नहीं होती थी ..गोत्र की अवधारणा आर्यों की वर्ण व्यवस्था में होती थी ..वहाँ जाति की जगह गोत्र  का प्रचालन था .जिससे जितने बड़े उच्च गुरु या ऋषी से दीक्षा ली वो गोत्र उतना ही बड़ा कहलाया . गोत्र यानी व्यक्ति का वो समूह जो अपने गुरु या  कुलगुरु  से दीक्षा लेकर उस नाम को धारण करता था जिससे उसने धर्म शिक्षा ली..हिन्दू धर्म में सात पीढ़ियों के बाद गोत्र बदलने की परम्परा भी धर्मानुकूल बताई गई हैं ..इसकी देखा देखी हिन्दू धर्म के शुद्र वर्ण में भी गोत्र परम्परा का चलन शुरू हो गया ..एक ही गोत्र में उत्पन्न व्यक्तियों को कुटुंब का रूप माना जाता रहा जिसमे उत्पन्न संतति आपस में भाई बहन माने जाते रहे

Saturday, 24 December 2011

मार्यादित पथ

चिरस्थायित्व विचारों का आईना
उल्लसित   करता हैं
आदमी के जीवन को ,
अविलम्बता सूरज के पीछे छिपे
अंधेरो में कैद रहती हैं 
ये  आप कैसे साबित करोगे
जीवन का कर्षनीय पथ
उजालो की और दौड़ता हैं
जबकि आसमान के नीचे
उजाला भी हैं
और अन्धेरा भी ,
जब हमारी भूख प्रश्न करती हैं
अस्पृह का गतिकांक
नीचे गिरने लगता हैं
मर्यादाएँ अविलम्बित होती हैं
जाने वाला कल
आने वाले कल को
खुदाहाफिज़ कहता हैं
इन्ही अधमुंदे पालो में
सूरज चुपचाप हिलता हैं
रोशनी से अँधेरे की बात करता हैं
और हम एक दुसरे से
कानाफूंसी करते हुए
आज को जन्म देते हैं ...........................रवि विद्रोही

Saturday, 17 December 2011

वास्तव में

वास्तव में तुम
तुम डरे हुए  लोग हो

पुराने फटेहाल छाते के नीचे
अपने आप को भ्रमित करते
एक सोच देते हुए कि
तुम बच जाओगे
वास्तव में
तुम मरे हुए लोग हो

क्षण में मासा
क्षण में तौला
झील की लहरों पर
चुपचाप चलते हो
दुनिया बदलने के नाम पर
अपने आप को छलते हो
बाद की बदनीयत को
कहना चाहते हो
पर खुद इसी  बदनीयत में
रहना चना हो
वास्तव में तुम
झूठ से लधे लोग हो

तुम्हारा  पल्लव विराट
और आसमानी कद
 ना डूब जाए
अंधेरो में
इसी बात पे दुनिया से झगड़ते हो
पर अपने ही कुछ लोगो को
नीच समझकर
रोज उनको घुटनों नीचे रगडते हो
दुनिया क्रान्ति लाती हैं
और तुम झूठी शान्ति
देखा जाए तो
शांन्ति के नाम पर
पाखण्ड में डूबे
वास्तव में
 तुम कायर लोग हो

महानतम  किताबे
रचते हो तुम
और उन्ही को पढ़कर
आँख के मरे हुए पानी से
नीच कहकर
इंसानों को गाली बकते हो तुम
तुम्हारी सभ्यता महान हैं
तुम्हारे आदर्श महान हैं
तुम्ही भगवान् बनते हो
तुम्ही शैतान बनते हो
मगर हकीकत तो ये ही है
वास्तव में तुम
दुनिया के जोकर लोग हो  ..................रवि विद्रोही

Saturday, 3 December 2011

अविरल उजास

चारो और फ़ैली धरती को चूम लेना
धरती  पर उगी
दुसरो की फसल को हड़प लेना,
कोई बोले तो
बारूद की तरह भड़क जाना
फिर चारो दिशाओं में घूम घूम के
इंसानियत के गीत गाना
अपने आप को इश्वर का दूत बताना
कोई इस पर कुछ बोले तो
उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना
कुछ लोगो के
जीने का ये ही तरीका होता हैं .

शीत ज्वाल

अंकुरित समुन्दर शौर मचाता है
एक अंधा प्रहार करता रेत पर
और दूसरा
बादलों पर,
यही बहुत है
आज लहरे उठती है
लेकिन कल आएगी क्रान्ति
शौर मचाता शून्य समुन्दर
शांत नहीं होगा

अवस्थाये

किसने दी पीड़ा पंछी को
पिजड़े की ,
किसने काट डाले पर
वो उड़ ना सके ,
किसने ठुसे अपने शब्द
उसके मुह में ,
ताकी वो वन के गीत
ना गा सके ,
पंछी की अहर्निश
भीषणतर हैं पिंजड़े के भीतर
विस्फोटक हो जाता हैं मन
जब देखता हैं इंसानों का
दानवी रूप,
कफस की दुनिया
किसे अच्छी लगती हैं ,
विद्रोही पंछी पिंजड़े में
मर जाते हैं
और पारदर्शी लाचार
पिंजरे को ही
अपना संसार मान लेते हैं,
नए धरातल पर
पिंजड़ो की शक्ल बदल रही हैं
तुम्हे पता ही नहीं
शोषण की लाठी ठोकते
कुछ बेरहम मानव
पिंजड़ो का कारखाना लगा रहे हैं

क्षुब्ध सरिता

ओ ह्रदय को कटती
कटु-तिक्त सरिता
मुक्त हैं तू अंतिम अवस्थाओं में
और व्यर्थ की प्रतीक्षाओं में
व्याकुल हूँ मैं
आओ
सागर के गूढ़, गूढ़तर पानी को
मथ दे
हे प्राज्य
शान्ति के लिए सुख को
सूख जाने दो .