Friday, 13 July 2012



देवता सदा ही आरोहित रहे हैं
उनके दौड़ाने की चाह अतिशयता
को लांघती हैं
आगे निकलने की प्रक्रिया
व्याख्यान नहीं सुनती
सोचो कुछ दिन
धरो कुछ धीरज
अतिसुग्राहिता को पूरी तरह
समझ सकने वाले लोग
करोडो के शहर में भी
एक हाथ की अंगुली पर
गिने जा सकते हैं
पासा फेंकने वाले लोग
उपदेशको से दूर ही रहते हैं
सिंहासन आज भी दुर्बल हैं
अहिल्या आज भी रोती हैं
शचि कैसे सहन करती थी
दुर्बल देवताओं का छद्मरूप
आज भी
देवताओं से अवतरित
और देवताओं की पत्नी की योनी से
जन्म का झांसा
उपदेशको के प्रवचनों में
प्रबल वेग भर देता हैं ...................रवि विद्रोही

Monday, 11 June 2012

कविता कितनी भी किलिष्ठ और साहित्यिक भाषा में कितनी ही प्रबल लिखी हो अगर वह भाषा पुराण, किंवदंती और मिथक एकेडेमिक्स में लिखी गई तो वह बुराई का प्रतीक हैं और उसका मर जाना ही बहतर हैं ..उस कविता का जीना भी क्या जो नैतिकता के पाश में ना बंधी हो..
प्रेम के नाम पर व्यभिचार और ऐय्याशी से भरा काव्यशास्त्र कूड़े में फेंकने लायक हैं

 समय के स्पन्दन और मुद्दों के कम्पन में
देखो कितना अंतर है
दोनों की शुभ्र कुटील मुस्कानों में
और आत्मीय स्नेह में
ना प्रश्न हैं ना उत्तर
बस इंसान निरउत्तर है.

अशआर ii

कमतर भी थी गंवारा ,बाकी की गनीमत हैं
दो घूँट बच रहे हैं , साकी भी मस्त अब तो ...

 इस तहे अफ्लाफ जमीं पर, आप कीजिये शुमार
जो खुद को खुदा कहते हैं, और खुद हैं खाकसार ......

तहे अफ्लाफ= आसमान के नीचे
 रंगी -अबाएं इश्क में, ये सितम भी इंतेखाब हैं,
जो कनीज लूट गई जहाँ, तेरा खुल्द लाजवाब हैं .....

रंगी -अबाएं इश्क= रंगीन प्यार में लिपटा हुआ
इंतेखाब= चुना हुआ
कनीज= जालिमो द्वारा ऐय्याशी के लिए रखी गई बेसहारा लडकियां
खुल्द = स्वर्ग

 बर खिलाफ शिकवे
हटाकर तो देखिये
हद-ऐ-नजर पढेगी
बेनियाज दिल हमारा .............रवि विद्रोही

अशआर

रश्क-ए-मुहब्बत गले पडी , एक .दर्द-ए-निहाँ सा लाई हैं
महफूज नहीं अब अश्क मेरा,यहाँ कब से जवानी छाई हैं 


 महबूब बर्हम हमसे, हम किससे करे शिकवा
मुजतिर हैं तबां नाजुक, दिलदार नहीं मिलते 


 सलाम ना सही ,मुस्कराहट दो दीजिये
अपने आने की हमें , आहट तो दीजिये .


 आज हवा ठहरी है, और घटा छाई है..
ना तो ये धूप हैं ना धूप की परछाई हैं.......... 


 आशना ही नहीं हम अभी, मंजिल के किनारों तक
महवे हैरत में जी अपना,दिलरुबाई हैं सितारों तक ..

आशना= परिचित

महवे हैरत = आच्चार्य में डूबा हुआ
दिलरुबाई= हृदय की मनोहर चाहत


 बर्क-ऐ-तपा के आगे ,कोई कैसे बच सकेंगा
अब्रे जहाँ ही क़ज हो, परस्तिश से ना गुजारा ..............रवि विद्रोही

बर्के तपा= बिजली की चमक

अब्रे जहाँ = बादलो का संसार
क़ज= कुटील
परस्तिश = पूजा पाठ/ स्तुति
अन्धो ने हमेशा ही
राज किया हैं और रार मचाई
कुर्बान हुए वीर जिनके
अंगूठे काट लिए गए
अब कोई पूंछ वाला
बचाने नहीं आयेगा
जिसने आग लगाईं थी नगरी में
अब तो अन्धो का एकमात्र सहारा हैं
बेटो के कंधो पर सवार होकर
तीर्थयात्रा पर निकला जाए
उस अमृत को चाटे
जो छिना गया था मक्कारी
और बेईमानी से
एकलव्य के बच्चे
जहर को भी अमृत बना रहे हैं
कटे हुए अंगूठे से नई दुनिया
बना रहे हैं
दर्द की अनुभूति
बता रही हैं कुछ बाहर
आने वाला हैं
कुदरत ने दर्द काहे बनाया ... . ..........रवि विद्रोही

Tuesday, 3 April 2012

चिर रहस्य ....


स्त्री के ह्रदय पर लिखे शब्द शायद ही हम पढ़ पाए ...आप स्त्री का सानिध्य इसलिए पाते हो कि आप मस्त हो जाओ और स्त्री इसलिए चाहती हैं कि वह आपकी मस्ती को कम कर दे ..जब वह मांगती हैं किसी के लिए तो जीवन तत्त्व मांग लेती हैं समस्त जीवन को प्रकट कर देती हैं ..मगर इसके बावजूद भी वह एकेलापन महसूस करे तब हम उसके अंतकरण की व्याख्या नहीं कर सकते ..बार मांगती हैं रहती वो रहस्य जहा वो सचमुच विचरण कर सके...पर क्या हम उसे ये दे पाए...

क्या मांगू मै उनसे
जिनके लिए माँगा था शहर
एक नाजुक वक्त में
वो बादलो को मेरे सीने पर
लाकर छोड़ देता है ,
धुप के नीचे
दिल के करीब
उस मुलाक़ात में
ना प्रश्न हैं ना उत्तर
ना निवेदन की तलाश,
मौन आँगन में
चुप-चुप छन कर आती धुप
नाज़ुक नहीं नटखट सी है
जख्म आज उतना बड़ा नहीं
जितना बड़ा प्रतीक्षारत होना,
करवटो में अक्सर
हल्‍की-हल्‍की वो चमक
सुन्न परिस्थितियाँ में
बेजुबान साज सी लगती है,
अनपढ़ बिलकुल ही अनगढ़,
आओ ,चले फिर से मदरसों में
कोई पाठ पढ़े,
स्मिति में छिपे
उन रहस्यों को बांचे
जहा चिर रहस्य रहता है
इतिहासों के बीच,
आओ ,
करीब और करीब आके
उस शहर को फिर से मांगे
जो माँगा था किसी के लिए

मन का विश्लेषण

स्त्री के कथित मन का विश्लेषण ..शायद इसे में गर्व हैं और इसी में साहस भी ...कुछ लोग स्वर्ग को तो तलाश लेते हैं मगर उसके द्वार की चाबी खो बैठते हैं ..मैंने स्त्री के मन में झांका और स्वर्ग की चाबी उसकी आँखों में कैद पाई,, मैंने कहा तुम मेरी आत्मा का दुसरा रूप हो क्या द्वार नहीं खोलोगी ..स्त्री ने झुक कर मेरी आँखों में देखा और कहा ..

कविता शब्द गढ़ती है
खुरदरे भी नाजुक भी
गीले गीले भाव से सने शब्द,
थर थर कांपते शब्द,
पीपल के पात जैसे
झन झन करती कठोर हँसी
ग्रास लिपटी जो
शिराओं से होती हुई
ह्रदय को थरथराती है ,
क्यों गढ़ते हो शब्द
मुझे गूंगी ही रहने दो,
नहीं दे पाउंगी उत्तर
सवाल पूछते शब्दों का
तुम्हारे साथ गहरे उतर कर
उस पोखर में
जहां रात आती है पूछने
चाँद क्यू नहीं निकला ,
औरत को पाने के सौ बहाने करते शब्द
गीले हो जाते है
तुष्टीकरण की आगे,
गूंगी हो जाती है भाषा
फिसलते है शब्द
सीने ने उठते है राग,
डरती हूँ दृढ़ता से
भावी स्वप्न स्नेह-प्रतीती शब्दों से
कही उत्पन ना कर दे अबोध बैराग्य ,
लीप दो मिट्टी हर चीज पर
सुबह सुबह
काले आकाश में खडीया से
लिखाई की है मैंने
शब्द आयेगे
बताने उत्तर .......