Sunday, 11 March 2012

सुखद सपने

अन्धो के इस शहर में
मेरा शीशे का व्यापार है
यहाँ धुंद की मृत्तिका अंधेरी है
फिर भी आँखों में सुनहरे भविष्य की
अकुलाहट का अधिकार है
झुलसी आशाओं की
सफ़ेद अंधेरी रातो में
एक नहीं ना जाने कितने
खुदगर्ज चाँद आ रहे है
मुझे मालूम है दर्पण के भाव ऊँचे है
और अन्धो की सोच ज़िंदा है
उनकी जाग्रत हंसी और सुरमे की सलाई
दर्पण में नजर नहीं आती
अंधी आँखों में आशाओं के सुखद सपने
फिर भी उन्हें भा रहे
और क्या कमाल है जनाब
अन्धो के इस शहर में
खोते जाइये और कहते रहिये
कि पा रहे हैं...

Saturday, 10 March 2012

वासना

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महाभारत पढी और जाना

धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे
और दस रानियाँ
जबकि वो अंधा था ,
अंधे पुरुष की अंधी वासना ,

पांडू के दो पत्नी  थी
और छ पुत्र
जबकि वो नपुकसंक था
नामर्द इंसान की छुपी  हुई  वासना

श्री कृष्ण के
सौलह हज्जार पत्नी  थी
और अनगिनित प्रेयेसी
जबकि वो भगवान था
मस्त भगवान की मस्त वासना

Friday, 9 March 2012

कूहसार

किस तार बाहर निकलू ,कूहसार तूफानों से
आँधी ने फलक अपना, तारीक बनाया हैं ........रवि विद्रोही

तार= तरिका
कूहसार= पहाड़
फलक= आसमान
तारीक = घना अन्धेरा / काला

इन पहाड़ जैसे विशाल तूफानों से मैं अपने आप को कैसे बचाऊ ...इस तूफानी बवंडर से कैसे बचू ..
इस बुरी आंधी ने आसमान को भी बुरी तरह ढक लिया हैं ..आसमान पर चारो और घना काला अन्धेरा छा गया हैं ...जहां कुछ भी नजर नहीं आ रहा ...

खुदाई तुझ में ही खुद हैं

नक्श नापेद हैं तेरा ,जलाजिल तू ही मस्दर हैं
तू अश्रफ हैं खुदाया की ,खुदाई तुझ में ही खुद हैं .......रवि विद्रोही

कुछ और हैं

सब थी सहर तब नूर था,नहीं इश्क अब पुरजोर हैं
डूबी हुई इस शाम में ,शायद वो अब कुछ और हैं ......Ravi Vidrohee

सहर= सुबह
नूर= उजाला

हम कैसे पढ़े

गतिहीन हैं अवचेतना,विनोक्ति भी अनुलोम हैं
फैसल -तलब आशुफ्त हैं,तक्बीर हम कैसे पढ़े ...............रवि विद्रोही


विनोक्ति=बिना चंद्रमा की रात
फैसल-तलब जिसका निर्णय होना बाकी हो
आशुक्त=व्याकुल /अस्त-व्यस्त
तक्बीर=नमाज में झुकते , बैठते खड़े होते वक्त पढ़े जाना वाला इश्वर का नाम

तहकीर सुनो

आँखों की तुम तक्सीर सुनो
आंसू में तुम तबशीर सुनो
आँखों ने पाया था कल जो
उस कल की तुम तहकीर सुनो ...........रवि विद्रोही ....