Friday, 9 March 2012

नमाज से तौबा

जाकर खुदा कह दो, अब नमाज से हैं तौबा
तक्बीर के इरादे ,गुनाहागार हो रहे हैं ..............रवि विद्रोही

हसरत नश्तर

ये फराज है जो हसरत नश्तर
क्या कसक है फलक दीवानी में
खिलती है तजम्मुल होठो पर
क्या खूब हँसी ये जवानी में.......................रवि विद्रोही

फराज= उचाई/ बुलंदी
तजम्मुल =सजावट

अन्सफ़ नादान

ख्यालो की निगाहबां में,अन्सफ़ नादान हैं कोई
वो खुद मेरा कल्ब हैं जी ,नहीं मेहमान हैं कोई .......रवि विद्रोही

अन्सफ़= बहुत ही प्यारा
कल्ब - ह्रदय

मुहब्बत की वुसअत


ख्याले खाम नहीं हैं मुहब्बत की वुसअत
खुद खुदाई तस्हील हैं हुश्ने नुबुव्वत में ........रवि
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Tuesday, 6 March 2012

खुमार

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 आँखों की तुम तक्सीर  सुनो
आंसू की तुम तबशीर  सुनो
आँखों ने पाया था कल जो
उस कल की तुम तहकीर  सुनो ...........रवि विद्रोही ....


तक्सीर=भूल/दोष /अपराध
तबशीर= सन्देश/सुचना
तहकीर= निंदा/अपमान/अनादर

दलित नेतृत्व..

भारत में दलित आज भौचक्के हैं उफाफोह में हैं....आज उन्हें लगता हैं कि  न उनको धर्म में सम्मान मिलता ना समाज में और ना ही राजनीति में ....जाए तो कहाँ जाए.... दरअसल ये सब कुशल, साकारात्मक   इमानदार व   प्रभावशाली  नेतृत्व ना होने की वजह से हैं .बिखरा हुआ संघठन उन्हें और नीचे ले जा रहा हैं...दम्भी , आकारात्मक असंगठित     नेतृत्व कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो अगर वह इमानदार और अपने  कृत्तव्यो के प्रति    समर्पित और उदार और संघठित नहीं  तो  मंजिल से पहले ही दम तौड़ देता हैं..दलित शक्ति को आज एक ऐसे प्रभावशाली नेतृत्व की जरुरत हैं जो सबको एक जगह बाँध ले जो ना  केवल सभ्य , शालीन और  बुद्धीमान हो बल्कि उदार , इमानदार और अपने काम के प्रति समर्पित  हो और सबको एक साथ संघठित कर सके ..प्राभावाशाली  नेतृत्व इतना बल शाली और कद्दावर हो कि इस शक्ति के उबाल को थाम सके और उनकी बहतरी के लिए इमानदारी से काम सके क्योकि इस शक्ति के उबाल में सदियों से दबी अपेक्षाए बहुत ज्यादा हैं और  उनकी अपेक्षाओं व  बहतरी का नतीज़ा शुन्य के आस पास ही मंडराता नजर आता हैं ..अपेक्षायो की भूख  तभी मिट पायेगी जब नेतृत्व वाकई इमानदारी और सच्चाई और संघठित होकर   काम करेगा .....केवल और केवल बिखरी हुई व्यक्तिगत सत्ता की भूख अपेक्षाओं को   बढाती ही हैं घटाती नहीं ..सता की भूख व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक हो सबके लिए हो , सबकी बहतरी के लिए हो तभी अपेक्षाए शांत हो पायेगी ....समाज के सब तबको को  साथ लेकर चलने की शक्ति का अभी दलित नेतृत्व में अभी बहुत अभाव हैं  ....सम्मान की भागीदारी तभी मिल पायेगी जब सबको उनके  ..अपेक्षाओं की प्राप्ति ही  सम्मान को आमंत्रित करती हैं ..बिना अपेक्षाओं को प्राप्त किये बिना  कोई भी समाज सम्मान नहीं पा सकता तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ सकता

Monday, 27 February 2012

भारत में जाति , वंश और गोत्र की अवधारणा

भारत में जाति  , वंश और गोत्र  की अवधारणा

जाति.......
आर्य समाज में जाति व्यवस्था नहीं होती थी वहाँ वर्ण व्यवस्था थी ...जाति की व्यवस्था भारतीय समाज में आर्यों के आने से बहुत पहले से ही थी ..जाति का सम्बन्ध व्यक्ति के कार्यो से निर्धारण होता था ..आर्यों  ने   भारत पर आक्रमण करके भारतीय राजनीति  पर अपना प्रभ्त्व स्थापित कर लिया था और भारतीय समाज को अपनी वर्ण वाव्यस्था में मिलाने के लिए एक नया वर्ण   बनाया जिसको शुद्र कहा गया ..भारतीय समाज की मूल वासी परम्परा के मुताबिक़ शुद्रो में जाति व्यवस्था  कायम रही जो आज तक हैं ..भारत मे आर्यों ने अपने प्रभ्त्व के  पश्चात पूरे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो में विभक्त कर दिया ..ये ही कारण था आर्यों ने चोथे वर्ण को अपने में मिला तो लिया परन्तु धार्मिक अधिकारों और पूजा पाठ से वंचित रखा .. आज भी ब्राह्मण , क्षत्रीय तथा वैश्य वर्ण हैं आज भी इनमे जाति नहीं होती जबकि शुद्र जाति व्यवस्था  से आज भी जुड़े हुए हैं ..हिन्दू धर्म में शुद्रो की पहचान जाति हैं वर्ण नहीं जबकि बाकी तीनो की पहचान वर्ण से हैं जाति से नहीं ..भारत में दलित अंत्यज या अछूत जातियाँ यद्यपि हिंदू समाज क अंग रही लेकिन    वर्णव्यवस्था में उनका कोई स्थान नहीं है इसलिए शुद्र अपने आप को इन जातियों से उंचा मानते रहे हालाकि जाति व्यवस्था इनमे भी कायम रही ..आज हम शुद्रो का अर्थ दलितों से लगाते हैं किन्तु यह बात भ्रमित हैं दलित शुद्र नहीं वर्ण में नहीं आते बल्कि जो जाति ब्राहमण , क्षेत्रीय,वैश्य या दलित नहीं वो शुद्र हैं

वंश ...
वंश का निर्धारण व्यक्ति के पूर्वज और स्थान से निर्धारित होता था ..आर्यों के वंशज भारत से बाहर के लोग थे जबकि आर्यों के चौथे वर्ण शुद्रो के वंशज मूल भारतीय के ..अब चुकी जाति का सम्बन्ध व्यक्ति के कार्यो से होता था अत किसी विशेष क्षेत्र या जाति  में एक ही काम करने वाले विभिन्न लोग होते थे जो भिन्न भिन्न वंशो से जुड़े होते थे ..प्राचीन अनार्य सभ्यता में इस बात का अधिकार होता था कि व्यक्ति अपना काम बदल सकता  था इसी  काम से उसकी  जाति की पहचान निर्धारित होती थी ..जाति में भिन्न भिन्न वंशो के व्यक्ति जुड़े हुए थे ...वंश यानी एक की व्यक्ति का समूह या उससे उत्पन्न संतति समूह  

गोत्र..
गोत्र की अवधारा मूल भारत  वासियों यानी शुद्रो में नहीं होती थी ..गोत्र की अवधारणा आर्यों की वर्ण व्यवस्था में होती थी ..वहाँ जाति की जगह गोत्र  का प्रचालन था .जिससे जितने बड़े उच्च गुरु या ऋषी से दीक्षा ली वो गोत्र उतना ही बड़ा कहलाया . गोत्र यानी व्यक्ति का वो समूह जो अपने गुरु या  कुलगुरु  से दीक्षा लेकर उस नाम को धारण करता था जिससे उसने धर्म शिक्षा ली..हिन्दू धर्म में सात पीढ़ियों के बाद गोत्र बदलने की परम्परा भी धर्मानुकूल बताई गई हैं ..इसकी देखा देखी हिन्दू धर्म के शुद्र वर्ण में भी गोत्र परम्परा का चलन शुरू हो गया ..एक ही गोत्र में उत्पन्न व्यक्तियों को कुटुंब का रूप माना जाता रहा जिसमे उत्पन्न संतति आपस में भाई बहन माने जाते रहे